5 Best Hindi Inspirational Story in Hindi 2024

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वीरता की कहानियाँ: शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ हजारों बरसों से बच्चों की दोस्त और हमजोली रही हैं। वे खेल-खेल में उन्हें बहुत कुछ सिखाती हैं। जो काम गूढ़ बातों और उपदेशों से भरे बड़े-बड़े पोथे नहीं कर पाते, उसे नन्ही- नन्ही रोचक कहानियाँ बड़े मजे से कर दिखाती हैं।

बच्चे कहानियों को पढ़ते या सुनते हुए कभी नहीं थकते। शायद कहानियों के साथ जुड़े हुए अद्भुत चरित्र या जिंदगी की रोचक दास्तानें ही उन्हें इतना रसपूर्ण और मनोरम बनाती हैं कि बच्चे दौड़- दौड़कर उनकी ओर जाते हैं।

साथ ही यह भी सच है कि बचपन में पढ़ी हुई कहानियों का असर पूरे जीवन भर उनके साथ रहता है। इस तरह कहानियाँ जाने-अनजाने बच्चों के व्यक्तित्व-निर्माण तथा उन्हें अच्छा और भला इनसान बनने में मदद करती हैं।

Best Hindi Inspirational Story

इस पोस्ट में बच्चों के लिए एक से एक अनूठी कहानियाँ सँजोई गई हैं, पर ये वे कहानियाँ हैं जिनमें कहीं इतिहास के अनलिखे पन्नों की झलक है,

तो कहीं प्राचीन युग के उन महान चरित्रों की दास्तान, जिन्होंने न्याय और सच्चाई के लिए भीषण लड़ाइयाँ लड़ीं और अपने प्राणों का बलिदान करके भी मानवता की रक्षा की। इन कहानियों में उन वीरतापूर्ण युद्धों की ललकार और तलवारों की झनकार भी सुनाई देगी,

जिनके साथ वीर शिवा और राणा प्रताप जैसे भारत के महानायकों की अमर गाथाएँ जुड़ी हैं। साथ ही देश की आजादी के लिए जान हथेली पर लेकर लड़ने और हँसकर फाँसी का फंदा चूमने वाले उन शहीदों की महान गाथाएँ भी इनमें समाई हुई हैं, जिन्हें याद करते ही हमारी आँखें भीग जाती हैं और सिर आदर से झुक जाता है। इन्हें पढ़ते हुए मन रोमांचित हो उठता है ।

सच तो यह है कि असंख्य बिजलियों जैसे अपने असाधारण शौर्य से नए युग का इतिहास तथा वीरता और साहस की नई कहानियाँ लिखने वाले इन महान वीरों के पराक्रम के कारण ही आज हम आजाद हैं और स्वतंत्र हवा में साँस ले पा रहे हैं ।

इस देश की आजादी के लिए अपना तन-मन- धन सब कुछ कुर्बान करने वाले महान वीरों ने कितना त्याग और कुर्बानी दी तथा बेशुमार तकलीफें झेलकर भी अपने फौलादी संकल्प से इतिहास की धारा को कैसे मोड़ा, इसे याद करते ही मन में जोश और भावनाओं का तूफान उठने लगता है ।

‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ पुस्तक में ऐसी ही कहानियाँ हैं जो हमारे भीतर भी देश, समाज और मानवता की भलाई के लिए कुछ कर गुजरने की सच्ची भावना और प्रेरणा उत्पन्न करती हैं।

इससे उनके सामने अपने जीवन को ऊपर उठाने और हर क्षण को किसी बड़े लक्ष्य के लिए खर्च करने की तड़प उत्पन्न होगी तथा भीतर एक बड़ा बदलाव नजर आएगा।

1. हिन्दी कहानी: चमक उठी तलवार
(Inspirational Story)

भले ही आज के युग में पहले की तरह तीर और तलवारों से लड़ने की बजाय, एकदम अलग ढंग की लड़ाइयाँ हमारे सामने हैं। पर वे भी तो हमसे उसी तरह के वीरता, त्याग और बलिदान की माँग करती हैं। बिना वीरता, त्याग और बलिदान के कोई भी महान कार्य नहीं किया जा सकता ।

Hindi Story – चमक उठी तलवार: कर्नाटक के काकतीय राजवंश की कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। वह वीरता और शौर्य में अपनी सानी नहीं रखता था। वीरता की कहानियाँ हमें देशभक्ति की शिक्षा प्रदान करती है।

इसी काकतीय राजवंश में एक सुंदर बालिका ने जन्म लिया, तो चारों ओर खुशियों के चिराग जल उठे। बालिका थी भी बड़ी सुंदर और बुद्धिमान आँखों में निराला तेज। इस सुंदर और तेजस्वी बालिका का नाम रखा गया चेन्नम्मा।

रानी चेन्नम्मा इतनी सुंदर और बुद्धिमान थीं कि उनके माता-पिता और परिवार के सभी लोग उन्हें देखकर मुग्ध होते थे। पर चेन्नम्मा के व्यक्तित्व में बचपन से ही वीरता की छाप थी। वह निडर तो थी ही। साथ ही उसे अस्त्र-शस्त्रों का अभ्यास अच्छा लगता। लोग कहते, “अरे, यह बालिका तो लड़कों से बढ़कर है। देखना बड़ी होकर यह इस राजवंश को कीर्ति में चार चाँद लगाएगी।”

बड़े होने पर चेन्नम्मा ने एक ओर घुड़सवारी और युद्ध-कला सीखी तो दूसरी कन्नड़ और संस्कृत समेत कई भाषाएँ सीखीं और उनके साहित्य का अध्ययन किया। यह देखकर सबको अचंभा होता कि सुंदर और तेजस्वी चेन्नम्मा की शस्त्र और शास्त्र दोनों में एक जैसी रुचि है। वह अपनी बुद्धिमत्तापूर्ण बातों से सबको चकित कर देती। और जब युद्ध- कला के प्रदर्शन का समय आता, तो उसका पराक्रम देख, लोग दाँतों दते उँगली दबा लेते।

कुछ समय बाद कित्तूर के राजा मल्लसर्ज से चेन्नम्मा का विवाह हुआ

उन दिनों कित्तूर बहुत समृद्ध राज्य था जिसमें हीरे-जवाहरात के बाजार लगते थे। स्वयं मल्लसर्ज बड़े बुद्धिमान और उदार राजा थे और प्रजा का बड़ा खयाल रखते थे। मल्लसर्ज अपनी वीर और बुद्धिमान रानी चेन्नम्मा को बहुत प्यार करते थे और उनकी सलाह से ही हर काम करते थे। यहाँ तक कि राज-काज में भी वे उनसे सलाह लिया करते थे।

लेकिन कुछ समय बाद ही कित्तूर के भाग्याकाश पर दुख के काले-काले बादल छा गए। हुआ यह कि एक बार पूना के राजा ने मल्लसर्ज को चालाकी से कैद कर लिया। सीधे-सरल मल्लसर्ज पूना के राजा की इस कपटचाल को समझ नहीं पाए। कुछ समय बाद कारावास में ही उनकी मृत्यु हुई।

चेन्नम्मा के लिए यह बहुत बड़ा आघात था। उनका हृदय हाहाकार कर उठा। पर दुख और शोक की इस घड़ी में भी उन्होंने धीरज नहीं खोया। अब उन्हें ही पूरी हिम्मत और धीरज से पति की जिम्मेदारियों को पूरा करना था।

चेन्नम्मा ने निर्णय करने में एक क्षण की भी देर नहीं की। उन्होंने बड़ी रानी रुद्रम्मा के बेटे शिवलिंग रुद्रसर्ज को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया और स्वयं बड़ी कुशलता से राज्य की देखभाल करने लगीं। कित्तूर राज्य फिर पहले की तरह ही तरक्की करने लगा।

पर अंग्रेज भला यह कैसे बर्दाश्त करते ? उनकी गिद्ध निगाहें कित्तूर पर लगी थीं, जिसे वे हर हाल में हड़पना चाहते थे।

कुछ समय बाद शिवलिंग रुद्रसर्ज की मृत्यु हुई तो अंग्रेजों को मौका मिला। उन्होंने कित्तूर को अंग्रेजी राज्य में मिलाने का फरमान जारी कर दिया। राजा शिवलिंग ने मृत्यु से पहले अपने गोद लिए पुत्र गुरुलिंग मल्लसर्ज को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। पर छल-बल के सहारे अपने राज्य का विस्तार करने वाली अंग्रेजी सत्ता और उसके प्रतिनिधि थेकरे ने यह मानने से इनकार कर दिया। उसने धमकी देते हुए कहा, “अब कित्तूर पर रानी चेन्नम्मा को कोई अधिकार नहीं है। हमारी नई नीति के अनुसार, कित्तूर पर हमारा अधिकार हो जाएगा। अगर रानी चेन्नम्मा नहीं मानेगी, तो

उसे इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।” कित्तूर राज्य के दो शक्तिशाली सरदार भी अंग्रेजों से जाकर मिल गए थे। इससे अंग्रेजों की हिम्मत और बढ़ गई।

पर रानी चेन्नम्मा की वीरता का अभी उन्हें अंदाजा नहीं था। उन्होंने सोचा कि एक स्त्री भला इतनी बड़ी अंग्रेजी सत्ता का मुकाबला करने का साहस कैसे कर सकती है ?

जल्दी ही थेकरे स्वयं सेना लेकर कित्तूर पहुँचा और उसने चेतावनी दी,

“रानी चेन्नम्मा आत्मसमर्पण कर दे, वरना किले को नष्ट कर दिया जाएगा।” पर थेकरे ने जो सोचा था, उससे उलटा हुआ। उसी समय किले का फाटक खुला और रानी चेन्नम्मा मर्दाना वेश में तलवार लेकर अपने रणबांकुरों के साथ निकलीं और अंग्रेजी सेना पर प्रलय बनकर टूट पड़ीं।

अंग्रेज सेना भौचक्की थी। उन्होंने तो सपने में भी यह नहीं सोचा था। रानी चेन्नम्मा मानो दुर्गा बनकर आ गई थी और अपनी लपलपाती तलवार से बड़ी तेजी से दुश्मनों को मौत के घाट उतार रही थी।

किसी को अंदाजा नहीं था कि रानी चेन्नम्मा युद्ध-कला और सैन्य- संचालन में इतनी दक्ष हैं। थोड़ी देर में ही अंग्रेज सेना में भगदड़ मच गई। थेकरे मारा गया और देशद्रोही यल्लप्प शेट्टी और वेकंटराव भी मौत की नींद में सुला दिए गए।

बहुत से सैनिक और अंग्रेज अधिकारी बंदी बना लिए गए। चारों ओर रानी

चेन्नम्मा की वीरता का जयघोष सुनाई देने लगा।

पर अंग्रेज चुप कहाँ बैठने वाले थे। थेकरे का युद्ध में मारा जाना उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती थी और वे जल्दी ही इसका बदला लेना चाहते थे। कुछ समय बाद अंग्रेजों ने आगबबूला होकर दोबारा कित्तूर पर हमला किया।

इस बार डीकन ने कमान सँभाली। अंग्रेजी सेना बहुत विशाल थी और

चेन्नम्मा के साथ सिर्फ मुट्ठी भर रणबांकुरे सैनिक थे, जो देश की मिट्टी के लिए अपने लहू की आखिरी बूंद तक बहाने के लिए तैयार थे। पर रानी चेन्नम्मा के मुट्ठी भर सैनिकों ने इस विशाल अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए

अंग्रेजों को एक बार फिर मुँह की खानी पड़ी थी। चारों ओर चेन्नम्मा की वीरता का जय-जयकार हो रहा था। अंग्रेजों को यह सहन नहीं हुआ।

इस युद्ध के कुछ ही समय बाद रानी चेन्नम्मा अभी सँभल भी नहीं पाई थीं कि अंग्रेजों ने फिर अपने शक्ति इकट्ठी करके विशाल सेना और भारी तोपखाने के साथ कित्तूर पर हमला बोल दिया। इस बार भी भीषण युद्ध हुआ, जिसमें कुछ सरदारों की गद्दारी के कारण रानी चेन्नम्मा बंदी बना ली गई। बंदीगृह की भीषण यातनाएँ झेलते हुए 21 फरवरी, 1829 को उन्होंने आखिरी साँस ली।

रानी चेन्नम्मा वीरता की अद्भुत मिसाल थीं, जिन्होंने साबित कर दिया कि देश की स्वतंत्रता और मान को ऊँचा रखने के लिए भारत की नारियाँ भी रणचंडी बनकर दुश्मनों से जूझ सकती हैं और उनके हृदय दहला सकती हैं। उन्होंने वीर सिंहनी की तरह अंग्रेजी सेना को जिस तरह छकाया, उससे पूरे देश में देशभक्ति और स्वाभिमान की लहर पैदा हुई। इसीलिए इस वीर रानी के बलिदान की अमर कथा आज भारत-भूमि के चप्पे-चप्पे में सुनाई देती है।

वीरता की अद्भुत मिसाल पेश करने वाली रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों से इतनी जवरदस्त मुठभेड़ की थी और उनके इस तरह छक्के छुड़ाए कि स्वयं अंग्रेज सेनानायक इस महान वीरांगना की तलवार का जौहर देखकर दाँतों तले उँगली दबा लेते थे। यहाँ तक कि अंग्रेज इतिहासकारों ने भी इस महान वीरांगना को बड़े आदर और सम्मान से याद किया है।

शिक्षा– इन कहानियों को पढ़ते हुए बाल पाठकों को समझ में आएगा कि वीरों के शौर्य और बलिदान की इन सच्ची गाथाओं ने उनके भीतर भी कुछ नया कर गुजरने तथा जीवन में बड़ी से बड़ी चुनौतियों का भी हँसकर मुकाबला करने का जज्बा पैदा कर दिया है।

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2. हिन्दी कहानी: जीजाबाई का सपना
(Inspirational Story)

हिन्दी कहानीः जीजाबाई का सपना – माँ जीजाबाई अपने छोटे से बेटे को रोज कहानियाँ सुनाती थी। वे कहानियाँ ध्रुव, प्रह्लाद और अभिमन्यु की थीं।

भारत के उन महान वीरों और रणबांकुरों की भी, जिनके शौर्य और वीरता ने एक नया इतिहास रचा। वह बालक भी उन्हें सुनता है और माँ से कहता है, “माँ, मैं भी बड़े होकर बड़े-बड़े काम करूँगा। बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़कर देश को स्वाधीन करूँगा।”

“शाबाश बेटे।” माँ के होंठों से निकलता है और आँखों से अपने नन्हे पुत्र के लिए ममता बरसने लगती है। से

“माँ, क्या तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है ?” नन्हा सा बेटा पूछता है। “पूरा यकीन है बेटे, इसीलिए तो तुझे मैं रोज देश के महान गौरव की कथाएँ सुनाती हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि तू एक दिन भारत भूमि को स्वाधीन करके इसके गौरव की रक्षा करेगा।”

महाराष्ट्र में शिवनेरी के पहाड़ी किले में जन्मा था यह वीर बालक । माँ जीजाबाई ने शिवा भवानी से बेटे की कामना की थी, इसलिए बेटे का नाम शिवा रखा गया। शिवाजी के पिता शहाजी ने तुकाबाई मोहते के साथ दूसरा विवाह कर लिया था और उसके साथ वे नई जागीर में रहने लगे थे। जीजाबाई अपने बेटे शिवा को लेकर पूना के निकट एक छोटी सी जागीर में रहने के लिए आ गईं। शहाजी ने दादाजी कोंडदेव को इस जागीर के प्रबंध का जिम्मा सौंपा। दादा जी बड़े वीर और बुद्धिमान थे। उन्होंने पूना में जीजाबाई के

रहने के लिए लालमहल बनवाया और कुशलता से जागीर का प्रबंध सँभालने लगे।

को ध्वस्त दादा जी ने ही मुगलों के खिलाफ लड़ने का अपार साहस भरा। उन्होंने ही शिवा को व्यूह-रचना सिखाई और छापामार लड़ाई से दुश्मन करने की रणनीति भी। अब तो शिवा के भीतर नया जोश जाग गया। देश और जननी के लिए कुछ करने की आकांक्षा करवट लेने लगी।

जैसे-जैसे शिवाजी बड़े हुए उनके भीतर यह संकल्प और भी मजबूत होता गया कि अपना तन-मन-धन सब कुछ समर्पित करके, हमें इस महान देश की स्वतंत्रता, गौरव और स्वाभिमान की रक्षा करनी होगी। देश की रक्षा के लिए जीवन भर लड़ने और अपना सब कुछ बलिदान कर देने वाले वीरों की सेना बनाकर अपना अभियान शुरू करना होगा।

और जल्दी ही उन्होंने ऐसे तरुणों को इकट्ठा कर लिया, जिनकी रग- रंग में देश के स्वाभिमान की लहर हिलोरें लेती थी और वह निरंतर उन्हें देश पर मर मिटने की प्रेरणा देती थी।

जल्दी ही शिवाजी ने अपनी छोटी सी लेकिन बड़ी ही लड़ाकू सेना बना ली। उन्होंने समझ लिया था कि भारतीय जनता को हीनता से उबारकर उसमें आत्मबल का संचार करने और उसे ऊँचे आदर्शों की राह पर ले जाने के लिए एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना बहुत जरूरी है। बस, अब वे प्राण- प्रण से इसी योजना में जुट गए और जल्दी हो सामरिक महत्व के कुछ छोटे पहाड़ी किले उन्होंने जीत लिए ।

इससे उनका आत्मविश्वास और बढ़ गया था। माता जीजाबाई का आशीर्वाद उनके साथ था। बड़े वीर और जुझारू साथी उन्हें मिल गए थे। मन में नई हिलोरें थीं। फिर भला उन्हें आगे बढ़ने से कौन रोक सकता था ?

फिर दादा कोंडदेव का बड़ा ही कुशल मार्गनिर्देशन पग-पग पर मिलता था। दादाजी कोंडदेव पिता के समान ही प्यार से उन्हें युद्ध और राजनीति की शिक्षा देते थे। इससे शिवाजी के भीतर साहस और सूझ-बूझ पैदा हुई।

उन्होंने युद्ध लड़कर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का निश्चय कर लिया। पूना जिले में तब कोली लोग रहते थे, जो लूटपाट और डकैती करते थे। दादाजी ने धीरे-धीरे इन्हें युद्ध और देशभक्ति की शिक्षा दी और यही लोग पहले- पहल शिवाजी के सैनिक बने 1

शिवाजी ने मावले लोगों की ऐसी वीर सेना बना ली जो हर खतरे से सकती थी। वे दुश्मन के किले में घुसकर ऐसी मारकाट मचाते कि वे लड़ भौचक्के होकर भाग खड़े होते और दुर्ग पर शिवाजी का झंडा लहराने लगता। लोग कहते, शिवाजी से जीतना आसान नहीं है। उन्हें तो सचमुच शिवजी का आशीर्वाद प्राप्त है और वही उनकी रक्षा करते हैं।

शिवाजी अपने सैनिकों से बहुत प्रेम करते थे और उनके हर सुख-दुख की परवाह करते थे। इसलिए सैनिक शिवाजी पर जान छिड़कते थे। विजयपुर राज्य की हालत बिगड़ने पर शिवाजी ने अपने वीर सैनिकों की मदद से तोरणा किला जीता और उसका नाम राजगढ़ रखा। कुछ समय बाद दादा जी का देहांत हो गया। उन्होंने मरते समय शिवा को आर्शीवाद दिया, “भवानी ने जो तुम्हें मार्ग दिखाया है, उसी पर चलो। तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा।”

इसके बाद शिवाजी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने कोंढाना किला जीता और उसका नाम बदलकर सिंहगढ़ रख दिया। बाद में बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के पिता शाहजी को कैद कर लिया, तो शिवा को उन्हें छुड़ाने के लिए बीजापुर सुल्तान के साथ संधि करनी पड़ी। बदले में उन्होंने बंगलुरु, कोंढाना और कंदपी के किले सुल्तान को सौंप दिए।

पर कुछ समय शांत रहने के बाद शिवा दूने जोश से अपने अभियान में जुट गए। एक-एक कर अनेकों महत्वपूर्ण किले उन्होंने जीते और अपने राज्य का दूर-दूर तक विकास कर लिया। बीजापुर सुल्तान ने अफजल खाँ को उन्हें परास्त करने भेजा। अफजल खाँ के पास बड़ी विशाल सेना थी। पर शिवाजी जरा भी नहीं डरे।

उनकी सेना का एक-एक वीर सैनिक शेर था, जो सैंकड़ों पर भारी था। दुष्ट और धोखेबाज सरदार अफजल खाँ भी यह बात जानता था कि शिवाजी को युद्ध में हराना उसके बस की बात नहीं है। लिहाजा वह छल और कूटनीति से उन्हें मारना चाहता था। उसने संधि

और बातचीत की पेशकश की। शिवाजी अच्छी तरह जानते थे कि अफजल खाँ के मन में क्या है ?

वह धोखे से उनका वध करना चाहता था। पर शिवाजी भी पूरी तरह सतर्क थे। वे बघनखा पहनकर गए थे। जैसे ही उन्हें अफजल खाँ के बुरे इरादे का पता चला, उन्होंने बघनखे से उनका पेट फाड़ दिया और चतुराई से बचकर निकल आए। इससे शिवाजी की चतुराई और कूटनीतिक कुशलता की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। हर ओर शिवाजी की वीरता और साहस की कहानियाँ फैल गई।

शिवाजी में भारतीय संस्कृति की रक्षा करने और मातृभूमि को स्वतंत्र करने का भाव जगाने वाले समर्थ गुरु रामदास की प्रेरणा और आशीर्वाद शिवाजी के लिए मानो रक्षा कवच बन गया था।

उन्होंने शिवाजी को आशीर्वाद देते हुए कहा था, “तुम देश की रक्षा के लिए युद्ध कर रहे हो। इसलिए माँ भवानी का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। वे तुम्हारा बाल बाँका नहीं होने देंगी।” और सचमुच बड़े से बड़े खतरों से बचकर वे सकुशल बाहर निकल आए।

हालाँकि शुरू में समर्थ गुरु रामदास उन्हें बड़ी मुश्किलों से मिले। शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास की तेजस्विता के बारे में सुना, तो उनसे मिलने के लिए विकल हो उठे। पर स्वामी रामदास भी उनकी परीक्षा ले रहे थे।

वे उनके सामने आते ही न थे। तब शिवाजी ने प्रतिज्ञा की, “जब तक समर्थ गुरु रामदास के दर्शन न कर लूँगा, तब तक मैं भोजन ग्रहण न करूँगा।”

आखिर शिवा की विकलता जानकर गुरु रामदास ने उन्हें दर्शन दिए। शिवा अपना सब कुछ त्यागकर गुरु जी की सेवा करना चाहते थे। तब गुरु रामदास ने उन्हें प्यार से फटकारते हुए कहा, “तो क्या इसीलिए तुम मेरे पास आए हो? तुम क्षत्रिय हो।

तुम्हारा काम देश और प्रजा की रक्षा करना है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था, उसे याद करो और अपना कर्त्तव्य पूरा करो। “

इससे शिवाजी के मन में नया जोश पैदा हुआ और उन्हें अपना कर्त्तव्य दिखाई देने लगा।

एक बार समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी से कहा, “शिवा, आज तुमसे भिक्षा माँगता हूँ। दे, तू मुझे जो भी दे सकता है ?”

शिवाजी बोले, “गुरुदेव, मैं तो अकिंचन हूँ। मेरे पास जो कुछ भी हैं, वह तो आपका दिया हुआ ही है। स्वराज्य का सपना भी आपने ही मुझे दिखाया। एक छोटा सा राज्य मेरे पास है। इसी को मेरी तुच्छ भेंट या भिक्षा समझ लें।” इतना कहकर शिवा ने अपना सारा राज्य ही एक कागज पर लिखकर उनके दान पात्र में डाल दिया।

इस पर गुरु रामदास ने मुसकराकर कहा, “ठीक है शिवा, आज से यह

राज्य मेरा हुआ। तुम मेरे प्रतिनिधि बनकर इसका प्रबंध सँभालो।” शिवाजी ने तभी से अपने झंडे का गेरुआ कर दिया। उन्होंने घोषणा की कि “यह राज्य गुरु रामदास का है और मैं तो उनका एक सेवक मात्र हूँ।”

औरंगजेब ने शिवाजी की शक्ति को निरंतर बढ़ते हुए देखा, तो महाराज जयसिंह को उन्हें पराजित करने के लिए भेजा। जयसिंह के समझाने पर शिवाजी अपने बेटे के साथ औरंगजेब से मिलने आगरा गए। पर औरंगजेब ने उनका अपमान किया और एक कोठरी मे बंद करवा दिया।

पर इस महान शेर को पिंजरे में कैद करना आसान न था। शिवाजी ने बीमार होने का बहाना बनाया। फिर धीरे-धीरे समाचार आने लगे कि शिवाजी अब स्वस्थ हो रहे हैं। इस खुशी में उन्होंने फलों के टोकरे बाहर भिजवाए। उन्हीं बड़े-बड़े टोकरों में छिपकर वे बेटे समेत किले से निकल आए। फिर घोड़े पर बैठकर बिजली की सी तेजी से अपने राज्य में जा पहुँचे। मुगल सम्राट औरंगजेब हक्का-बक्का रह गया।

जिस समय शिवाजी हिंदू रीति से राजगद्दी पर बैठे, उन्होंने दल-बल के साथ रायगढ़ में जुलूस निकाला। आगे-आगे हाथी पर भगवा झंडा था। यह वास्तव में समर्थ गुरु रामदास के वस्त्र का ही एक टुकड़ा था। शिवाजी ने इसी को प्रतीक रूप में अपना ध्वज बनाया।

कुछ वर्ष बाद ही इस महान देशभक्त योद्धा का निधन हुआ। पर उन्होंने एक शक्तिशाली हिंदू साम्राज्य की स्थापना करके भारत के गौरव को फिर से ऊँचा उठाने का जो संकल्प किया था, उसे बहुत कुछ अपने सामने पूरा होते देख लिया। उनका स्मरण करते ही मन में वीरता की लहर पैदा हो जाती है।

अगर शिवाजी की तरह ही देश के लिए कुछ करने का भाव हो, तो हमारा देश फिर से अपने पुराने गौरव और वैभव को हासिल कर सकता है, जब कि सारी दुनिया इसे सोने की चिड़िया कहकर पुकारती थी।

3. वीरता की कहानी- हल्दी घाटी का महान योद्धा
(Inspirational Story)

Haldi Ghati Ka Mahan Yodha Story in Hindi: ‘चाहे अपने प्राणों को भी दाँव पर क्यों न लगाना पड़े, पर मैं इस देश की धरती की इज्जत पर किसी को बट्टा नहीं लगाने दूँगा, मैं मर जाऊँगा पर अकबर के आगे सिर नहीं झुकाऊँगा ।

उसे भी तो पता चले कि इस देश के राजपूत कितने पानीदार हैं। यहीं तो मेरे दादा राणा साँगा ने कितनी ही बार दुश्मनों को धूल चटाई। और अब मैं मुगल सम्राट अकबर को यह बता दूँगा कि असली राजपूत वे नहीं हैं

जिन्होंने उसके आगे सिर झुकाकर अपना स्वाभिमान बेच दिया । असली राजपूत तो वे हैं जो अपने रक्त की आखिरी बूँद भी इस धरती पर भेंट चढ़ाते हैं।” 

राणा प्रताप मेवाड़ की पहाड़ियों के बीच एक छोटे से पथरीले मैदान में टहल रहे थे, जिसे चारों ओर से घने पेड़ों और विशाल चट्टानों ने ढक रखा था। उनके भीतर तेज अंधड़ चल रहा था । 

और इसका एक कारण यह भी था कि राजा मानसिंह उनसे मिलने आने वाले थे । मानसिंह ने अकबर की स्वाधीनता स्वीकार कर ली थी और अब अकबर के राजनीतिक दूत बनकर ही उनसे बात करने आ रहे थे ।

मानसिंह यहाँ आकर कौन सी बात चलाएँगे और हितैषी होने की आड़ में उन्हें कैसी सलाह देंगे, यह राणा प्रताप पहले ही जान चुके थे । “ओह, कितना कठिन समय है यह।” राणा भीतर ही भीतर बहुत उद्वेलित थे, ”

अकबर ने शिवपुर कोटा, चित्तौड़ जैसे शक्तिशाली किलों पर अधिकार कर लिया है । इस देश की धरती पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं । मातृभूमि सिसक रही है और जिन्हें इस दुख और पराधीनता की घड़ी में

उठकर एक साथ जवाब देना चाहिए था, वे जैसे नशे में धुत्त हैं । लेकिन ऐसे में ही तो एक सच्चे देशभक्त की परीक्षा होती है ।

” चाहे कुछ भी हो जाए, मैं मेवाड़ को अकबर के कब्जे में नहीं जाने दूँगा। मेवाड़ की रक्षा के लिए मैं अपना सर्वस्व बलिदान कर दूँगा। मेरी प्रतिज्ञा है कि जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र न होगा, मैं न राजमहलों में वास करूँगा, न कोमल शैया पर सोऊँगा और न कोई उत्सव मनाऊँगा । चाहे सागर अपनी मर्यादा छोड़ दे, हिमालय गौरव और सूरज तेज छोड़ दे, पर मैं अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोडूंगा। मानसिंह को अभी पता नहीं कि सच्ची वीरता क्या होती है ?

” उसे तो शायद यह भी नहीं पता कि मेवाड़ के पर्वत ही क्यों राणा प्रताप के महल और दुर्ग बन गए हैं। घास की रोटी खाकर भले ही गुजारा करना पड़े, पर मैं मेवाड़ की आन-बान को झुकने नहीं दूँगा। मेवाड़ के स्वाभिमान को बचाए रखने का मेरा युद्ध जीवन की आखिरी साँस तक चलता रहेगा ।”

राणा का क्रोध बढ़ता जा रहा था। थोड़ी देर में ही सेवक ने आकर संदेश सुनाया कि मानसिंह उनसे मिलने आए हैं ।

राणा प्रताप का मानसिंह से मिलने का बिल्कुल मन नहीं था । पर मानसिंह उनके संबंधी थे, इस नाते कुछ तो शिष्टचार निभाना था । इसलिए उनके आने का संदेश सुनकर वे उनसे मिलने के लिए उदय सागर झील तक

आए।

मानसिंह राणा प्रताप से बड़े प्रेम से मिले। फिर समझाया, “मैं आपकी भलाई की ही बात कह रहा हूँ प्रताप । आपको बादशाह अकबर से एक बार भेंट जरूर कर लेनी चाहिए, क्योंकि अकबर उदार तथा हिंदुओं का सम्मान करने वाला है । आपका वह जरूर आदर करेगा।”

” और इस मातृभूमि की भलाई की बात कौन सोचेगा ? कौन इस देश की धरती के स्वाभिमान की बात सोचेगा ? वीरता की महान परंपरा वाली देश की धरती आज बेहाल होकर सिसक रही है। उसके बारे में कौन

सोचेगा ?” कहते-कहते राणा के चेहरे से जैसे लपटें निकलने लगीं।

देखकर मानसिंह के चेहरे का रंग उड़ गया। फिर भी उन्होंने एक कोशिश और की। राणा प्रताप को अकबर की ताकत से डराना चाहा। उन्होंने अपने स्वर को थोड़ा मुलायम बनाते हुए कहा, “देखो, मेरा काम समझाना था प्रताप, वह मैंने कर दिया। अकबर के बल का अभी आपको अंदाजा नहीं है कि वह क्या कर सकता है ? अगर आप सर्वनाश को ही आमंत्रित करना चाहते हैं, तो फिर मैं क्या कर सकता हूँ ?”

“मैं मृत्यु से नहीं डरता और इस देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने में मुझे खुशी होगी। पर जरा बताइए, अकबर आज अगर इतना बलवान है तो उसे ऐसा बनाने में क्या आपके समर्पणमै कोई भूमिका नहीं निभाई ? अगर सभी राजपूत मिलकर टक्कर लेते, तो क्या अकबर को परास्त करके,

अपनी मातृभूमि को स्वाधीन करना इतना मुश्किल था ? पर अकबर चाहे जितना भी शक्तिशाली हो, उसे मैं मेवाड़ की धरती को आक्रांत नहीं करने दूँगा, चाहे इसके लिए मुझे जो भी बलिदान करना पड़े। आपको शायद पता नहीं कि मैंने प्रतिज्ञा की है कि चाहे कुछ भी हो जाए,

मैं मेवाड़ को अकबर के कब्जे में नहीं जाने दूँगा। मेवाड़ की रक्षा के लिए मैं अपना सर्वस्व बलिदान कर दूँगा। मेरी प्रतिज्ञा है कि जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र न होगा, मैं न राजमहलों में वास करूँगा, न कोमल शैया पर सोऊँगा और न कोई उत्सव मनाऊँगा चाहे सागर अपनी मर्यादा छोड़ दे,

हिमालय गौरव और सूरज तेज छोड़ दे, पर मैं अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोडूंगा। क्या इसके बाद भी आप कहेंगे कि मैं आप ही की तरह अकबर की अधीनता स्वीकार कर लूँ और उसका मुसाहिब बनकर रहूँ?”

सुनकर मानसिंह भौचक्के रह गए। फिर उनसे एक शब्द भी नहीं कहा गया। राणा प्रताप को लोग मेवाड़ का सिंह कहते थे। आज उन्होंने जान लिया कि यह सिंह कैसा है और उसकी गर्जना से कैसे भीतर हलचल मच जाती है।

बाद में भोजन के समय राणा प्रताप खुद मानसिंह के साथ भोजन करने नहीं आए तथा अपनी जगह बेटे को भेज दिया। मानसिंह सब समझ गए ।

उन्हें यह अपना अपमान लगा। बोले, “प्रताप, अब तुम्हारा मान-मर्दन न करूँ तो मेरा नाम मानसिंह नहीं ।”

प्रताप बोले, “अगली बार तुम्हारा स्वागत युद्ध के मैदान में अपनी तलवार से करूँगा।”

कुछ समय बाद अकबर ने मानसिंह को राणा प्रताप पर आक्रमण करने भेजा। साथ में विशाल सेना थी । हल्दी घाटी में दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ । राजपूतों का जौहर देखकर मुगल सैनिक हक्के-बक्के थे । राणा प्रताप के घोड़े चेतक ने उछलकर मानसिंह के हाथी पर हमला किया। इससे उसे चोट आ गई। जब महाराणा प्रताप लौट रहे थे, कुछ मुगल सैनिकों ने उनका पीछा किया।

राणा का घोड़ा घायल हो चुका था। मुगल सैनिक अच्छा मौका देख, राणा प्रताप को घेर लेना चाहते थे। इनमें राणा प्रताप का छोटा भाई शक्तिसिंह भी था जो अब अकबर से जाकर मिल गया था। शक्तिसिंह ने भी परिस्थिति भाँप ली थी। उसने तेजी से अपना घोड़ा दौड़ाकर मुगल सैनिकों को खत्म कर डाला। और ‘भैया’ कहते हुए महाराणा प्रताप के गले से जा लगा। दोनों की आँखों से आँसू बरस रहे थे। राणा प्रताप चाहते थे कि शक्तिसिंह हमेशा के लिए उनका साथ दे, पर शक्तिसिंह अपनी जगह मजबूर था। उसने चेतक के न रहने पर राणा प्रताप को अपना घोड़ा दे दिया और खुद मुगलों की सेना में लौट आया।

इसके कुछ समय बाद की बात है। एक बार राणा प्रताप की छोटी बेटी को भूख लगी तो महारानी प्रभामयी ने उसे घास की रोटी बनाकर दी। एक वनविलाव उसे छीनकर भाग गया तो भूखी बच्ची रो पड़ी। उसकी यह हालत देखकर राणा प्रताप की आँखों से आँसू निकलने लगे। उसी समय उन्होंने अकबर को संधि – पत्र लिख भेजा ।

उसे पाकर अकबर फूला न समाया । पर पृथ्वीसिंह जैसे राजपूतों को लगा, जैसे हिमालय पृथ्वी पर झुक गया है। उन्होंने कहा, “जहाँपनाह, मुझे तो लगता है कि यह शत्रु का धोखा है। राणा प्रताप की लिखाई मैं भली-

भाँति पहचानता हूँ । ये उनके दस्तखत नहीं हैं। मैं एक पत्र भेजकर उनसे सत्यापन करवा लेता हूँ ।”

इसके बाद पृथ्वीसिंह ने प्रताप के पास जो पत्र भेजा, उसमें वीरता के ऐसे भावों के साथ महाराणा प्रताप को याद किया गया है कि पढ़ते ही वे फड़क उठे । सोया सिंह मानो जाग उठा हो । बोले, “पृथ्वी, तुम्हारे पत्र का उत्तर मैं तलवार से दूँगा।” उन्होंने भामाशाह के दिए हुए धन से फिर से अपनी सेना संगठित की और युद्ध की तैयारियों में जुट गए।

जीवन भर युद्ध करने के बाद भी राणा प्रताप अपनी आँखों के सामने मातृभूमि की स्वतंत्रता के अपने स्वप्न को साकार होते न देख सके। वे मृत्यु शैया पर पड़े थे, पर चिंता देश की थी। उन्होंने मरने से पहले अपने पुत्र अमरसिंह से प्रतिज्ञा करवाई कि वह देश को स्वतंत्र करने की उनकी प्रतिज्ञा को जी-जान से पूरा करेगा।

मेवाड़ का यह सूर्य अस्त हो गया पर उसकी लाली से आज भी आसमान लाल है और उसकी याद आज भी हमारे भीतर सच्ची वीरता की लहर पैदा कर देती है। वीरता की कहानियाँ समाज में ऐसे ही जोश भर देती है।

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4. रानी लक्ष्मी बाई खूब लड़ी मर्दानी झांसी वाली रानी
(Inspirational Story)

Rani Laxmi Bai Story: बिठूर के महल में कुछ बच्चे किले की लड़ाई का खेल खेल रहे हैं। उसमें नाना और दूसरे बच्चे अपना-अपना दिमाग लगाकर दुश्मन के किले पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं, पर उन्हें कामयाबी नहीं मिलती।

तभी छोटी सी, चंचल बच्ची मनु जो उनके साथ ही खेल रही है, इशारे से कहती है, “अरे, किले को जीतने के लिए तो इधर से चढ़ाई करनी होगी।”

देखकर दूसरे बच्चे हैरान हैं, पर मनु की सलाह उन्हें माननी पड़ती है। बच्चों के साथ-साथ बड़े भी यह खेल देख रहे हैं। सबके मुँह से एक साथ निकलता है, “अरे, मनु तो बड़ी होशियार है।”

फिर कुछ दिन बाद बच्चों को घुड़वारी सिखाई जाती है। बच्चे अपने- अपने घोड़े को दौड़ते हुए महल की ओर आ रहे हैं। तभी नाना के घोड़े को ठोकर लगती है। नाना गिर पड़ता है। मनु उसी समय अपना घोड़ा रोकती है। और नाना को अपने साथ ही घोड़े पर बैठा लेती है। फिर घायल नाना को साथ लेकर महल में पहुँच जाती है।

जिसने भी यह दृश्य देखा, हैरान हो गया, “अरे, यह छोटी सी बालिका तो बड़ी ही समझदार और बुद्धिमान है।”

यही छोटी सी बालिका मनुबाई बड़ी होकर लक्ष्मीबाई कहलाई और चारों ओर उसकी वीरता और शौर्य की कहानियाँ फैलने लगीं। उनके पिता मोरोपंत पेशवाओं के बड़े विश्वासपात्र थे। जब अंग्रेजों ने बाजीराव पेशवा को गद्दी से उतारकर चिमनाजी अप्पा को गद्दी पर बिठाकर

मनमानी करनी चाही, तब स्वाभिमानी चिमनाजी मोरोपंत को साथ लेकर काशी आ गए। काशी में ही 19 नवंबर, 1835 को लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ। अभी वह चार वर्ष की ही थी कि उसकी माता भागीरथीबाई का देहांत हो गया। मोरोपंत बेटी को लेकर बाजीराव के पास बिठूर आ गए। मनुबाई सुंदर, चंचल और बुद्धिमती थी। वह दिन भर नाना साहब के साथ खेलती। नाना साहब बाजीराव पेशवा के दत्तक पुत्र थे।

बहुत जल्दी मनुबाई ने घोड़ा दौड़ाना, तीर और तलवार चलाना सीख लिया। वह वीर थी, बुद्धिमती और सुंदर थी। झाँसी के राजा गंगाधर राव ने मनुबाई की बहुत प्रशंसा सुनी। उन्होंने मनुबाई से विवाह की इच्छा प्रकट की। अब मनुबाई झाँसी की रानी बन गई। उनका नाम हो गया लक्ष्मीबाई।

गंगाधर राव लक्ष्मीबाई से बहुत प्रेम करते थे। उन्हीं से पूछकर राजकाज चलाते थे। लक्ष्मीबाई हमेशा प्रजा के हित की बात सोचती थीं इसलिए झाँसी की प्रजा रानी को बेहद चाहती थी। कुछ समय बाद लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। घर-घर में खुशियाँ मनाई गईं क्योंकि अब राज्य का वारिस पैदा हो हो गया था और झाँसी अंग्रेजों के चंगुल में जाने से बच गई थी।

पर यह खुशी थोड़े ही दिन रही। तीन महीने भी पूरे नहीं हो पाए थे कि बच्चा चल बसा। इस दुख को महाराज गंगाधर राव सहन नहीं कर सके। उन्होंने खाट पकड़ ली। अंत समय समीप था। हाँ, मरने से पहले उन्होंने दामोदर राव को गोद ले लिया। अंग्रेजों से प्रार्थना की कि दामोदर राव को झाँसी का वारिस स्वीकार कर लिया जाए।

कुछ समय बाद गंगाधर राव गुजर गए। अभी लक्ष्मीबाई यह दुख सहन भी न कर पाई थीं कि बड़े लाट साहब का आदेश आया, “सरकार दामोदर राव को महाराज गंगाधर राव का वारिस नहीं मानती। झाँसी लावारिस है इसलिए उसे अंग्रेजी राज्य में मिला लिया जाएगा।” साथ ही रानी को साठ हजार रुपए की पेंशन बाँध देने और किला छोड़कर चले जाने का आदेश दिया गया।

यह सुनकर रानी लक्ष्मीबाई छटपटा उठीं। उन्होंने निश्चय कर लिया कि चाहे जो हो, वे अपनी झाँसी नहीं छोड़ेंगी। उन्होंने फिर से तलवार चलाने और घुड़सवारी करने का अभ्यास शुरू कर दिया। राज्य की बागडोर और अधिक मजबूती से सँभाल ली। प्रजा की भलाई के लिए बहुत सी योजनाएँ। शुरू कीं। उधर सेना की शक्ति बढ़ा दी गई।

लड़ाई के लिए बारूद और तोपखाने का इंतजाम किया गया। रानी खुद मर्दाने वेश में सेना का निरीक्षण करतीं तथा अपने सैनिकों में जोश भरा करती थीं। चाहे जो भी हो, वे जान पर खेलकर भी अपनी झाँसी की रक्षा करेंगी उनका यह अटूट संकल्प था।

यह वही समय था जब सारे देश में 1857 के स्वाधीनता संग्राम के विद्रोह की लहर उमड़ रही थी। झाँसी की रानी भी इस संग्राम में कूद पड़ी। झाँसी को अंग्रेजों से बचाकर रखना और विद्रोह में मदद देने का जिम्मा

उनका था। वे पूरी तरह स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय थीं तथा अंग्रेजों की दमन नीति का विरोध कर रही थीं। इसी बीच सदाशिव राव ने खुद को झाँसी की गद्दी का हकदार बताकर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई ने उसे सबक सिखाया। अभी वे साँस भी न ले पाई थीं कि ओरछा के दीवान ने हजारों सैनिकों को साथ लेकर झाँसी पर हमला कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई बहादुरी से लड़ीं और उन्होंने विजय प्राप्त की।

अब अंग्रेजों का ध्यान भी झाँसी की ओर गया। सर ह्यूरोज के नेतृत्व में एक बड़ी सेना ने आकर झाँसी को घेर लिया। झाँसी की रानी ने अपनी सेना की कमान खुद सँभाली। वे रोज रात भर जागकर खुद किले की व्यवस्था को देखत, सैनिकों का उत्साह भरतीं। युद्ध आरंभ हुआ। रानी लक्ष्मीबाई बहुत हिम्मत से लड़ीं। उनके सैनिकों ने भी जान की बाजी लगा दी। लेकिन विशाल अंग्रेजी सेना का मुकाबला करना आसान नहीं था। जब तक किले की तोपें गरजती रहीं, अंग्रेजों की आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं पड़ी। लेकिन रानी का विश्वासपात्र तोपची गुलाम गौस खाँ मारा गया था। बारूदघर में अंग्रेजों का गोला आ पड़ा तो सैकड़ों सिपाही मारे गए। रानी लक्ष्मीबाई दोनों हाथों में तलवार लेकर रणचंडी की तरह युद्ध कर रही थीं।

बारह दिन बीत चुके थे। अब लड़ाई को जारी रखना असंभव था। रानी ने झाँसी को छोड़ने की बजाय वहीं प्राण दे देने का निश्चय किया। लेकिन सरदारों ने समझाया, “स्वाधीनता के युद्ध के लिए आपका बच निकला जरूरी है। अब तो सारे भारत की स्वाधीनता के लिए युद्ध करना होगा।”

आखिर रानी अपने घोड़े पर बैठकर निकल भाग और कालपी पहुँच गई। नाना साहब के भाई राव साहब किले में थे। उन्होंने रानी का स्वागत किया। फिर से लड़ाई की योजना बनाई गई। नई मोर्चाबंदी की गई, पर राव साहब सोचते, ‘मैं एक स्त्री की अधीनता क्यों स्वीकार करूँ ?’

रानी लक्ष्मीबाई सेना की मोर्चाबंदी को मजबूत करना चाहती थीं, पर राव साहब ने उनकी बात अनसुनी कर दी। इसी कारण जब अंग्रेजों ने कालपी पर आक्रमण किया तो रानी लक्ष्मीबाई ने अपने मोर्चे पर तो उनके छक्के छुड़ा दिए, लेकिन राव साहब वाला मोर्चा टूट गया।

कालपी छोड़कर सभी विद्रोहियों ने अब गोपालपुर में आश्रय लिया। यहीं तात्या टोपे भी आकर इस दल में मिल गए थे। सब मिलकर भी तय नहीं कर पा रहे थे कि अब अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई कैसे जारी रखी जाए?

रानी लक्ष्मीबाई बोलीं, “ग्वालियर यहाँ से थोड़ी दूर है। ग्वालियर का महाराज जियाजी राव भले ही अंग्रेजों का भक्त है, लेकिन उसकी सेना जरूर हमारा साथ देगी।”

सबने मिलकर ग्वालियर की ओर कूच कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई ने सिर्फ अपने ढाई सौ विश्वासपात्र सैनिकों को लिया और सिंहनी की तरह टूट पड़ीं। जियाजी राव को भागना पड़ा। ग्वालियर की अधिकांश सेना रानी के साथ मिल गई और रानी लक्ष्मीबाई का जय-जयकार करने लगी।

ग्वालियर का किला हाथ में आ गया तो नाना साहब को पेशवा घोषित किया गया। रानी बार-बार आग्रह करती थीं कि अब किले और सेना का ठीक से प्रबंध किया जाए। लेकिन पेशवा होकर नाना साहब राग-रंग में सब भूल गए। उनके सैनिकों का भी यही हाल था। रानी लक्ष्मीबाई की बात किसी ने नहीं सुनी।

जल्दी ही अंग्रेजों ने ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया। राव साहब ने सोचा, ‘रानी लक्ष्मीबाई स्त्री हैं, वह भला सेना का संचालन क्या कर पाएँगी ?’

तो भी रानी लक्ष्मीबाई पूरी सतर्कता से सब कुछ देख रही थीं। जाँच और परख रही थीं। रानी ने ऐसी व्यूह रचना की थी कि ह्यूरोज के लिए आगे बढ़ना असंभव हो गया। रानी के वफादार सैनिकों ने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए।

यह देखकर अंग्रेजी सेना दूसरे मोर्चे की ओर बढ़ी, पर रानी ने उसका रास्ता भी जाम कर दिया। उस दिन अंग्रेजी सेना को बुरी तरह मुँह की खानी पड़ी। जीत का सेहरा रानी के सिर पर बँधा, पर उनका प्यारा घोड़ा बुरी तरह घायल हो चुका था।

दूसरे दिन भी भीषण युद्ध हुआ। रानी ने अपनी पीठ पर बालक दामोदर राव को बाँधा हुआ था। अंग्रेज गोलियाँ दाग रहे थे, लेकिन रानी तलवार थामे घोड़ा दौड़ाती हुई आगे निकल आईं। साथ में उनकी विश्वासपात्र सहेलियाँ भी थीं। उन्होंने अंग्रेजों की मोर्चेबंदी को तोड़ दिया।

पेशवा की फौज के पाँव उखड़ चुके थे। लेकिन रानी अंग्रेजों के व्यूह को काटते हुए आगे निकलती गईं। उन्होंने अपने बचाव के लिए एक सिपाही पर प्रहार किया। इतने में उन्हें अपनी प्रिय सखी की चीख सुनाई दी।

उन्होंने वार करने वाले अंग्रेज का सिर उड़ा दिया और घोड़ा दौड़ाती चली गईं। सामने नाला था। लेकिन रानी का प्रिय घोड़ा तो खत्म हो गया था। यह नया घोड़ा था। नाले को देखकर अड़ गया।

अंग्रेजों ने आकर रानी लक्ष्मीबाई को घेर लिया। रानी के सिर पर तलवार का वार किया गया। लेकिन रानी ने मरते-मरते भी उस अंग्रेज सवार को खत्म कर दिया।

रानी के विश्वासपात्र अंगरक्षक रामचंद्र राव ने पास की कुटिया में रानी का शव रखा और चिता में आग लगा दी। महान् वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने

रणक्षेत्र में लड़ते हुए एक सच्चे वीर जैसी मृत्यु पाई। उस समय उनकी आयु केवल 23 साल थी, लेकिन उनका नाम देश के बच्चे-बच्चे की जबान पर चढ़ चुका था। वे अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष और विद्रोह की प्रतीक बन गईं।

उनमें इतना साहस और वीरता थी कि स्वयं अंग्रेजों ने उनकी बहुत प्रशंसा की थी। ह्यूरोज ने रानी की प्रशंसा करते हुए लिखा, ‘महारानी का उच्च कुल, आश्रितों और सिपाहियों के प्रति उनकी असीम उदारता और कठिन से कठिन समय में भी अडिग धीरज, उनके इन गुणों ने रानी को हमारा एक अजेय प्रतिद्वंद्वी बना दिया था।

वह शत्रु दल की सबसे बहादुर और सर्वश्रेष्ठ सेनानायिका थीं।’

भारत के स्वाधीनता संग्राम में उन वीरांगनाओं का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा, जिन्होंने देश के लिए हँसते-हँसते अपनी जान की बाजी लगा दी।

उन वीर स्त्रियों में सबसे महान थीं, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। इस महान रानी के बलिदान को याद करके कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान ने बड़े ओजपूर्ण शब्दों में लिखा है-

चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

5. मदनलाल ढींगरा एक निर्भीक क्रांतिकारी
(Inspirational Story)

Madan Lal Dhingra: बाईस साल की छोटी सी उम्र एक मासूम सा नौजवान समय 1 जुलाई, 1909 1 स्थान : लंदन का इंपीरियल इंस्टीट्यूट। यहाँ एक समारोह में कर्जन वायली भी शामिल हैं। लोग खुश हैं। एक-दूसरे से खुशी से मिल रहे हैं। खा-पी रहे हैं।

अचानक दनादन गोलियाँ चलने की आवाज ठाँय ठाँय- 1 ठाँय… ठाँय ! एक के बाद एक पाँच गोलियाँ। भगदड़ मच गई है। कर्जन वायली का खून से लथपथ शव जमीन पर पड़ा है। एक पारसी डॉक्टर ने शव के पास आने की कोशिश की। झट से छठी गोली डाक्टर के सीने से उतर गई है।…

हाँ, यह बाईस साल का अकसर चुप्पा सा रहने वाला मासूम सा नौजवान मदनलाल ढींगरा था,

जिसने खुदीराम बोस, कन्हाईलाल दत्त और सत्येंद्रनाथ बसु को फाँसी पर चढ़ाने वाले विलियम कर्जन वायली को इस तरह सरेआम गोलियों से भूनकर अपने देशभक्त नौजवान साथियों की मौत का बदला ‘अपने ढंग से लिया था।

उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि चेहरे पर परम संतोष था, मानो उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो। वह समय ही ऐसा था। लोगों में,

खासकर नवयुवकों में देश पर मर मिटने की इच्छा जोर मार रही थी। फिजा में ही क्रांति की गंध फैली हुई थी और देश के नौजवान बड़ी तेजी से इस राह पर बढ़ रहे थे।

देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराना है, बस एक यही लक्ष्य उन्हें दिखाई पड़ता था, जिस पर वे बेहिचक बढ़ रहे थे। मदनलाल ढींगरा का जन्म सन् 1887 में अमृतसर के एक जाने-माने खत्री परिवार में हुआ। इनके पिता जाने-माने शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ

शल्य चिकित्सक थे, जिनकी ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफादारी जग-जाहिर थी। इसी राजभक्ति से खुश होकर अंग्रेजों ने उन्हें ‘राय साहब’ का खिताब भी दिया था। मदनलाल ढींगरा अपने सात भाइयों में छठे नंबर पर थे।

पिता तो डॉक्टर थे, पर बेटों ने अन्य खत्री परिवारों की तरह व्यवसाय को ही अपनाया था। मदनलाल ढींगरा के एक बड़े भाई लंदन में व्यापार सिलसिले जाते रहते थे और वहाँ अकसर रहते भी थे।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मदनलाल ढींगरा को भी अपने इसी भाई के पास भेजा गया। वहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया, और कर्जन वायली वाले हत्याकांड को जब अंजाम दिया गया, तब भी मदनलाल ढींगरा उसी इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे थे।

लंदन में उन दिनों ‘इंडिया हाउस‘ क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था।

इसकी स्थापना श्यामजी कृष्ण वर्मा और दामोदर विनायक सावरकर ने की थी। यह भारतीय छात्रों के आपसी संपर्क और मिलने-जुलने का एक प्रमुख स्थान था। भारत से जो भी छात्र लंदन पढ़ने के लिए जाते थे,

श्यामजी कृष्ण वर्मा और सावरकर की कोशिश होती कि उनमें से हर छात्र, खासकर नवयुवक लोग इंडिया हाउस से जुड़ें। श्यामजी कृष्ण वर्मा उन दिनों अपने यहाँ आए नवयुवकों में देशभक्ति की ऐसी भावना पैदा कर देते थे कि नवयुवक मातृभूमि को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए प्राणों की आहुति देने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाते थे।

मदनलाल ढींगरा का परिवार अंग्रेज भक्त माना जाता था। लिहाजा अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण लंदन पहुँचने पर मदनलाल ढींगरा इंडिया हाउस से दूर ही रहते थे।

हाँ, कभी-कभार वे वहाँ जाते थे और सन् 1908 में एक बार लगभग छह महीने के लिए वहाँ रहे भी थे। पर वे ज्यादा बोलते नहीं थे, अकसर चुप ही रहे थे। सन् 1909 में इंडिया हाउस में होने वाली बैठकों में वे भाग लेते थे।

अंग्रेज सरकार इंडिया हाउस को शक की नजर से देखती थी और वहाँ की हलचलों की जासूसी भी होती रहती थी। इसी कारण उस समय पंजाब के गवर्नर कर्नल विलियम कर्जन वायली ने भी मदनलाल ढींगरा को सख्ती से समझाया था कि वह इंडिया हाउस से कोई संपर्क न रखे।

मदनलाल ढींगरा अंदर ही अंदर सुलगकर रह गए थे। पर तभी से कर्नल वायली के प्रति उनके मन में एक खुंदक पलने लगी थी। मदनलाल ढींगरा का छोटा भाई भजनलाल भी इन दिनों यानी 1909 में आगे की पढ़ाई के लिए लंदन आ गया था। वह तो मानो मदनलाल ढींगरा के लिए एक जासूस ही बन गया।

उनकी हर गतिविधि की खबर वह अमृतसर पहुँचाता रहता, जिससे घर वाले बराबर मदनलाल ढींगरा को पढ़ाई पर ही ध्यान देने की हिदायतें देते रहते। साथ ही किसी फसाद में न उलझने की चेतावनी देते रहते

पर मदनलाल ढींगरा का मन देशभक्ति के जिस रास्ते पर चल पड़ा था, अब उसे वहाँ से कोई नहीं मोड़ सकता था। अब वे बाकायदा सावरकर की क्रांतिकारी संस्था ‘अभिनव भारत’ के सदस्य बन गए थे। इसी संस्था के

द्वारा उन्हें जो पहला काम सौंपा गया था, वह कर्जन वायली का सफाया करना। आखिर वह दिन भी आ पहुँचा, जब उन्हें अपने सौंपे गए काम को पूरा करना था। यानी 1 जुलाई, 1909 का दिन।

कर्नल विलियम कर्जन वायली लंदन के इंपीरियल इंस्टीट्यूट में एक समारोह में भाग लेने आए थे। मदनलाल ढींगरा भी इस समारोह में पहुँच गए। समारोह की समाप्ति पर जब कर्जन वायली चलने को हुए,

तो मदनलाल ढींगरा ने एकदम पास आकर उन पर दनादन पाँच गोलियाँ चला दीं। कर्जन वायली तुरंत ढेर हो गए और उनके साथ ही एक डॉक्टर भी, जो उन्हें बचाने आया था।

यह काम पूरा करके मदनलाल ढींगरा के चेहरे पर ऐसी गर्वपूर्ण दीप्ति थी, मानो उन्होंने कोई किला फतह कर लिया हो। मन से वे परम शांत थे। उन्हें पकड़ लिया गया।

इस कारनामे से मानो उन्होंने अंग्रेज सरकार को चेतावनी दी थी कि अब भारत को गुलाम बनाने वाले अंग्रेज अपने देश में भी सुरक्षित नहीं है।

इस घटना के तुरंत बाद मदनलाल ढींगरा जैसे क्रांतिकारी देशभक्त के घर वालों की जो प्रतिक्रिया थी, उसे पढ़कर किसी का भी मन आहत और शर्मसार हुए बगैर नहीं रहा सकता।

मातृभूमि को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने का प्रयास करने वाले मदनलाल ढींगरा के पिता ने इस घटना की घोर निंदा करते हुए मदनलाल ढींगरा को अपना पुत्र मानने से ही इनकार कर दिया। उनका कहना था कि “उसने मेरे मुँह पर कालिख पोत दी है।”

यह अलग बात है कि आगे आने वाले समय ने पूरी तरह सिद्ध कर दिया है कि कालिख किसने किसके चेहरे पर पोती थी।

ढींगरा के जो भाई लंदन में रहते थे, उन्होंने भी 4 जुलाई को कर्नल वायली के लिए आयोजित एक शोक-सभा में इस घटना की निंदा करते हुए निंदा प्रस्ताव पास करवाना चाहा। सावरकर ने जिनकी प्रेरणा से मदनलाल ढींगरा ने इस घटना को अंजाम दिया था, इसका विरोध करना चाहा। तब एक अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें घूँसा मारा।

सावरकर के मित्र थिरूमल आचार्य पास ही खड़े थे। उन्होंने अपनी लाठी से उस अकड़बाज अंग्रेज अधिकारी पर हमला किया। इस सारे घटनाक्रम के कारण वह निंदा-प्रस्ताव पारित न

हो सका। दूसरी तरफ, इंडिया हाउस में मदनलाल ढींगरा को ‘मातृभूमि का वीर सेवक’ कहकर सम्मान दिया गया। मदनलाल ढींगरा पर लंदन में हत्या का मुकदमा चला और सिर्फ बाईस दिन बाद ही,

उन्हें फाँसी की सजा भी सुना दी गई। फाँसी के लिए 17 अगस्त, 1909 का दिन तय कर दिया गया।

अपने मुकदमे के दौरान वीर क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा ने जो बातें कहीं, वे आगे आने वाले नौजवानों के देशभक्ति के पथ पर दृढ़ता से डटे रहने की प्रेरणा देने वाली थीं। उन्होंने कहा, “हिंदू होने के कारण मैं अनुभव करता हूँ कि मेरे राष्ट्र का दासत्व मेरे ईश्वर का अपमान है। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए किया गया कार्य भगवान कृष्ण के लिए हैं।

मैं न धनी हूँ, न योग्य। इसलिए मेरे जैसा गरीब बेटा माता की मुक्ति की वेदी पर अपने रक्त को छोड़कर अन्य कुछ भेंट नहीं कर सकता। इस कारण मैं अपने को बलि देने के विचार पर प्रसन्न हो रहा हूँ। मेरी हार्दिक प्रार्थना है कि मैं अपनी माता के गर्भ से फिर जन्म लूँ और इसी पुनीत कार्य के लिए मरूँ, जब तक कि मेरा उद्देश्य पूरा न हो जाए और मातृभूमि के हित तथा परमात्मा के गौरव के लिए हमारा देश मुक्त न हो जाए।”

उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका दाह संस्कार हिंदू रीति से हो और उनके सगे भाई उनके शव को स्पर्श भी न करें। पर आनन-फानन में उन्हें 17 अगस्त, 1909 को पेटनविले में फाँसी दे दी गई और जेल की चार दीवारी में ही दफना दिया गया।

श्यामजी कृष्ण वर्मा ने उनके इस बलिदान को इन भावपूर्ण शब्दों में याद किया, “ढींगरा का बलिदान स्वतंत्रता के लिए है। उन्होंने अकले ही ब्रिटिश भूमि पर खड़े होकर ब्रिटेन के अत्याचार को ललकारा है।” अगस्त में मदनलाल ढींगरा को फाँसी दी गई और लाला हरदयाल, जो स्वयं क्रांतिकारी विचारों के धुनी स्वाधीनता सेनानी थे

और क्रांतिकारियों की भरसक मदद करते थे, सितंबर में ‘वंदेमातरम्’ नामक पत्रिका निकाली। उसका पहला अंक ‘बलिदान अंक’ था। इसमें लाला हरदयाल ने इन शब्दों में ढींगरा को याद किया, “मदनलाल ढींगरा वे वीर थे, जिनके उपास्य शब्दों तथा कृत्यों का हमें शताब्दियों तक सच्चे हृदय से ध्यान करना चाहिए। ढींगरा ने प्राचीनकालीन राजपूतों के समान आचरण

किया।…उन्होंने भारत में अंग्रेजों की प्रभुसत्ता को घातक चोट पहुँचाई है।” भले ही अंग्रेजों ने मदनलाल ढींगरा को उनकी अंतिम इच्छा के विरुद्ध पेटनविले जेल की चारदीवारी में दफन कर दिया, पर क्या वे उनकी मिट्टी से उठने वाली क्रांतिकारी गंध को भी दफना पाए, जिसने आगे आने वाली नौजवान पीढ़ी को उसी रास्ते पर तेजी से अग्रसर होने और आत्मबलिदान करने के लिए प्रेरित किया।

इसी क्रांतिकारी भावना से प्रेरित होकर कितने ही नौजवान मातृभूमि की बलिवेदी पर हँसते-हँसते प्राण न्योछावर कर गए। उन्हीं की बदौलत आज भारत आजाद हुआ और हम आज आजाद हवा में साँस लेते हुए, पूरे विश्व के सामने एक स्वतंत्र देश के रूप में गर्व से सिर उठाए खड़े हैं।

Conclusion

‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ पुस्तक में बाल पाठकों को अपने बड़े इरादों और संकल्प से युग का नया इतिहास लिखने वाले बहुत से महान शूरवीरों की वीरता और साहस की गाथाएँ एक जगह पढ़ने को मिलेंगी।

आशा करते है बच्चे इन वीरता की कहानियों को पढ़ेंगे तो उन्हें अपने भीतर प्रेरणा का नया उजाला फैलता नजर आएगा। उम्मीद है कि शौर्य और बलिदान की इन कहानियों के जरिए सीखे हुए सच्चे साहस के पाठ बच्चों और किशोर पाठकों के साथ जीवन भर रहेंगे और उन्हें कभी आदर्श-पथ से डिगने नहीं देंगे।

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मेरा नाम मनोज वर्मा है। मैं बिहार के छोटे से शहर मुजफ्फरपुर से हूँ। मैने अर्थशास्त्र ऑनर्स के साथ एम.सी.ए. किया है। इसके अलावे डिजाईनिंग, एकाउटिंग, कम्प्युटर हार्डवेयर एवं नेटवर्किंग का स्पेशल कोर्स कर रखा हूँ। साथ ही मुझे कम्प्युटर मेंटनेंस का 21 वर्ष का अनुभव है, कम्प्युटर की जटिल समस्याओं को सूक्ष्मता से अध्ययन कर उनका समाधान करने एवं महत्वपूर्ण जानकारियों को डिजिटल मिडिया द्वारा लोगों तक पहुँचाना चाहता हूँ, ऑनलाईन अर्निंग, बायोग्राफी, शेयर ट्रेडिंग, कम्प्युटर, मोटिवेशनल कहानी, शेयर ट्रेडिंग, ऑनलाईन अर्निंग, फेमस लोगों की जीवनी के बारे में लोगो तक जानकारी पहुँचाने हेतु लिखता हूँ।
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